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शास्त्री मास्टर




पूरा गाँव शांतिनाथ शास्त्री को 'शास्त्री मास्टर' के नाम से पहचानता था। वे हैड मास्टर के पद से सेवानिवृत हुये थे। सविता उनकी इकलौती संतान थी जो शहर के कालेज में पढ़ती थी। गाँव का हर भला बुरा आदमी शास्त्री जी का सम्मान किया करता था। उन्होने जब भी किसी को कोई सलाह दी तो नेक ही दी। उनके पढ़ाये छात्र भले ही किसी बड़े पद पर ना पहुँच पाये मगर सभी नेक इंसान जरूर थे। सेवानिवृति के बाद शास्त्री जी का काम था गाँव के बड गट्टे पर बैठ अख़बार पढ़ना और समाज़ के पतन पर चिंता जताना। उन्हे दुख था तो टूटते रिश्तों पर। वे अक्सर सभी को समझाया करते थे की व्यक्ति को चाहिए की वो समाज़ को मजबूत बनाये क्यों की यदि समाज़ टूटता है, बिखरता है तो इसका असर सभी पर होगा, चाहे वो अच्छा हो या बुरा।

शास्त्री जी ने अपनी पुत्री की परवरिश में कभी कोई कसर नहीं छोड़ी। उसे अच्छे से अच्छे संस्कार दिये। अब उनका विचार था की सविता की पढ़ाई पूरी होते ही किसी नेक लड़के से उसका विवाह कर दिया जाय।

एक रोज सविता कॉलेज जाने के लिए घर से निकली मगर वापस लौटी नहीं। शास्त्री जी ने खूब कोशिश की मगर उसका पता नहीं लगा पाये। पुलिस भी जाँच में व्यस्त थी।

तीन महीने बाद पता चला की सविता अपने पति के साथ शास्त्री जी से मिलने आई। सविता बालिग थी सो उसने न्यायालय में शादी रचा ली। गाँव वालों की माने तो उसका पति पहले से ही शादीशुदा था और उसने पहली पत्नी को छोड़ दिया था।

इस घटना के बाद लोगों ने शास्त्री जी को ना तो कभी बड़ गट्टे पर अख़बार पढ़ते देखा और ना ही घर से बाहर।

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