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चाबी वाला बन्दर




नीरज केंद्रीय सेवा में अध्यापक पद पर कार्यरत था। उसकी पत्नी, उषा भी अध्यापक ही थीं, मगर ओहदे में नीरज से एक पायदान ऊपर। दोनों अपने पुत्र आनंद जो की दो साल का था, के साथ सरकारी आवास में रहते थे। उनकी बूढ़ी माँ अकेले गाँव में रहती थी। ऐसा नहीं था की नीरज माँ को अपने साथ रखना नहीं चाहता था। माँ को ही उनके साथ रहना कुछ भाता नहीं था। माँ का राम तो गाँव में ही राजी था। घर के आँगन में खाट बिछा कर सोने में जो आनंद था वो सरकारी आवास में कहाँ था। माँ को सरकारी आवास में अजीब घुटन होती थी। वहाँ सभी बुद्धिजीवी थे। कोई बगैर काम किसी से बात भी नहीं करता था। सभी टेलीविज़न से चिपके रहते थे। गाँव में माँ को किसी टेलीविज़न की जरूरत नहीं पड़ती थी। गाँव के हर कोने की खबर देने बूढ़ी औरतें दिनभर आती जाती रहतीं थीं। बूढ़ी औरतें माँ को गाँव की हर छोटी बड़ी खबर से वाकिफ़ करवाती और माँ उन्हे बदले में चाय पिलाया करती। माँ अपना खर्चा चौमासे की फसल से निकाल लेती थी। उसने कभी नीरज से कुछ मांगा नहीं।

नीरज अक्सर माँ से मिलने अकेला ही गाँव आता था। नीरज के बार बार कहने पर माँ कुछ दिन उनके साथ सरकारी आवास में रहने को राजी हो गईं। उषा को माँ शायद कुछ आउटडेटेड सी लगती थी। वो माँ को बार बार हिदायतें देती रहती थी, मसलन कोई आए तो कैसे बात करनी हैं,  सोफे पर कैसे बैठना चाहिए.......।

माँ ने सरकारी आवास पहुँचते ही थैले से "चाबी वाला बंदर",  जो उसने खासतौर पर गाँव के बड़े मेले से  पोते आनंद के लिए खरीदा था, निकाला और आनंद के हाथों में थमा दिया। उषा ने जब आनंद के पास सस्ता सा खिलौना देखा तो उसने तुरंत ही महँगे वाला हेलिकॉप्टर आनंद को खेलने को दे दिया।

आनंद ने अचानक महँगे हेलिकॉप्टर को फेंक चाबी वाले बंदर को उठा लिया और हँस हँस कर उससे खेलने लगा। माँ भी उसकी पीठ थपथपाने लगी। उसके लाये खिलौने के साथ आनंद को खेलते देख माँ की खुशी का ठिकाना न था ।

अगले रोज सुबह माँ ने कचरे के डिब्बे में चाबी वाले बंदर को फेंका हुआ देखा।

शाम को माँ ने नीरज से कहा " बेटा, मेरा जी यहाँ कतई नहीं लगता, तू मुझे वापस गाँव ही छोड़ आ......देख, चौमासा भी आने को है, मुझे अभी खेत में बहुत काम करना है।"

माँ अपने कपड़े थैले में जमाने लगी। थैले में कपड़े अब आसानी से आ रहे थे क्यों की अब उसमें "चाबी वाला बंदर" नहीं था।  
◘◘◘

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